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आंसू बहाने तक सीमित न हों हमारी संवेदनाएं

Posted On: 27 May, 2013 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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naxal-435दो दिन पूर्व छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेताओ की परिवर्तन रैली पर हुए नक्सली हमले के बाद राज्य से लेकर केंद्र तक की सरकारें हिली हुई है। इतना ही नहीं इन हमलों के बाद एक बार फिर ख़ुफ़िया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। ठीक वैसे ही निशान जैसे वर्ष 2010 में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में सीआरपीऍफ़ कैम्प पर हुए नक्सली हमले के बाद खड़े हुए थे। उस समय नक्सलियों के खिलाफ कार्यवाही के दावें बड़े जोर शोर से किये गए था। राज्य की भाजपा सरकार से लेकर केंद्र की कांग्रेस सरकार ने नक्सलियों पर सख्त कार्यवाही का भरोसा दिलाया था। पर नतीजा ढाक के तीन पात जैसा रहा। सवाल यह उठता है कि तेरह राज्यों के लगभग तीन सौ से अधिक जिलों में अपनी पैठ जमाए बैठे नक्सलियों से निपटने और उनके खात्मे के लिए कोई ठोस रणनीति अब तक क्यों नहीं बनी।

इसका सीधा जवाब है इस मसले का भी राजनैतिककरण हो जाना। दरअसल किसी भी दल ने इस मसले पर गंभीरता से विचार किया ही नहीं । वो चाहे देश की सत्ता पर राज करने वाली कांग्रेस हो या फिर राज्य की सत्ता पर आसीन भाजपा हो। वोट बैंक की राजनीति में दोनों ही राजनैतिक दलों के आकाओं ने यह सोचने की जहमत नहीं की कि आम आदमी, राजनेताओं और सुरक्षा बलों के साथ खूनी होली खेलने वाले और लाशो का ढेर लगाकर प्रदेश में दहशत का पर्याय बन चुकी नकसली समस्या का समाधान क्या हो ? देश के राजनैतिक इतिहास में इससे पूर्व शायद ही कोई ऐसी बड़ी घटना घटी हो जिसमे एक साथ इतने नेताओं को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया हो। ऐसे में यह विचार करने योग्य प्रश्न है कि आखिर हमारी सुरक्षा व्यवस्था में कहां छेद रह गया जिसके चलते इतनी बड़ी वारदात हो गयी।

अगर हम परिस्थतियों का अध्ययन करें तो पायेंगे कि यह घटना सुरक्षा और खुफियां एजेंसियों की आपसी सामंजस्य की कमी का परिणाम हैं। पर मजे की बात ये है कि कोई भी घटना की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। यहाँ गौर करने योग्य बात ये है कि घटना की घटित होने से लेकर मीडिया में सुर्ख़ियों बने रहने तक घटना के घटित होने के लिए जिम्मेदार लोग इस तरह की घटनाओ पर लगाम लगाने के लिए बेहतर और कारगर योजना बनाने की बात करते है पर समय के साथ सारे दावे और योजनाये कागजो की खूबसूरती बढ़ाने की काम आते हैं। इसलिए बेहतर होगा नक्सली हमले के लिये जिम्मेदार संस्थाएं यानि हमारी सरकारे, सुरक्षा एजेंसीज और ख़ुफ़िया विभाग अपनी कथनी और करनी में एकरूपता लाये। यह वक्त हाथ पर हाथ धरकर बैठने या कमजोर होने का नहीं बल्कि उचित रणनीति बनाकर नकसली समस्या को समूल जड़ से खत्म करने का है। अन्यथा वो दिन दूर नहीं होगा जब राज्यों से निकलकर नक्सली लोकतान्त्रिक अस्मिता के प्रतीक हमारी राजधानी दिल्ली पर भी हमले का साहस जुटा लेंगे।



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
May 30, 2013

Good one. nice sharing. simply superb. Plz visit my blog & give feedback.

yogi sarswat के द्वारा
May 29, 2013

इसका सीधा जवाब है इस मसले का भी राजनैतिककरण हो जाना। दरअसल किसी भी दल ने इस मसले पर गंभीरता से विचार किया ही नहीं । वो चाहे देश की सत्ता पर राज करने वाली कांग्रेस हो या फिर राज्य की सत्ता पर आसीन भाजपा हो। वोट बैंक की राजनीति में दोनों ही राजनैतिक दलों के आकाओं ने यह सोचने की जहमत नहीं की कि आम आदमी, राजनेताओं और सुरक्षा बलों के साथ खूनी होली खेलने वाले और लाशो का ढेर लगाकर प्रदेश में दहशत का पर्याय बन चुकी नकसली समस्या का समाधान क्या हो ? देश के राजनैतिक इतिहास में इससे पूर्व शायद ही कोई ऐसी बड़ी घटना घटी हो जिसमे एक साथ इतने नेताओं को नक्सलियों ने मौत के घाट उतार दिया हो। ऐसे में यह विचार करने योग्य प्रश्न है कि आखिर हमारी सुरक्षा व्यवस्था में कहां छेद रह गया जिसके चलते इतनी बड़ी वारदात हो गय, नेताओं की हत्या होने के बाद ही ज्यदातर सरकारें ऐसे मामलों में जागती हैं !


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